विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर विचार गोष्ठी एवं फिल्म प्रदर्शन आयोजित

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर विचार गोष्ठी एवं फिल्म प्रदर्शन आयोजित

पंचकूला : हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के उर्दू प्रकोष्ठ की ओर से विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस की पूर्व संध्या पर अकादमी भवन, सेक्टर-14, पंचकूला स्थित महाराजा दाहिर सेन सभागार में ‘विचार गोष्ठी एवं फीचर फिल्म—यादें 1947’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने की। मुख्य वक्ता डॉ. चंद्र त्रिखा, निदेशक, उर्दू प्रकोष्ठ ने विभाजन की त्रासदी से जुड़े अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा, “मैं उस समय केवल तीन वर्ष की आयु का था। विभाजन की त्रासदी को झेलते हुए मैं अपने परिवार के साथ पाकपटन से भारत आया था।” उन्होंने विभाजन पर अपनी लिखी साहित्यिक रचनाओं की भी चर्चा की और बताया कि विभाजन की पीड़ा और उससे उपजी स्मृतियों ने उनके लेखन को गहराई से प्रभावित किया।

प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने कहा कि विभाजन की त्रासदी को केवल याद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें इसके मूल कारणों की तलाश और उनका गंभीरता से अध्ययन करना होगा। उन्होंने कहा कि इतिहास की इन घटनाओं से सबक लेकर यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भविष्य में ऐसी विभाजनकारी और मानवीय त्रासदी दोबारा न हो। उन्होंने आपसी भाईचारे, सामाजिक सौहार्द और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।
संस्कृति प्रकोष्ठ के निदेशक डॉ. सीडीएस कौशल ने भी अपने विचार रखते हुए विभाजन की विभीषिका से जुड़े मानवीय पक्षों पर प्रकाश डाला।
कुरुक्षेत्र से आए श्री केशव मेहता ने ‘यादें 1947’ फीचर फिल्म प्रस्तुत की। फिल्म के प्रदर्शन और इसके निर्माण की प्रक्रिया पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि विभाजन की घटनाओं, उनसे जुड़ी स्मृतियों और मानवीय अनुभवों को फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए किस प्रकार सामग्री जुटाई गई तथा फिल्म के निर्माण के दौरान किन चुनौतियों और अनुभवों से गुजरना पड़ा।
अकादमी के सदस्य सचिव मनजीत सिंह ने बताया कि अकादमी परिसर में विभाजन विभीषिका पर केंद्रित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई है। यह प्रदर्शनी 27 अगस्त तक आम जनता और स्कूलों के विद्यार्थियों के अवलोकनार्थ लगी रहेगी। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति अकादमी परिसर में आकर प्रदर्शनी में विभाजन की त्रासदी से जुड़ी तस्वीरों और अन्य सामग्री को देख सकता है। उन्होंने अधिक से अधिक लोगों, विशेषकर विद्यार्थियों से इस प्रदर्शनी का अवलोकन करने की अपील की।
कार्यक्रम का डॉ. जतिन्दर परवाज़ ने कुशलतापूर्वक संचालन किया। उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न वक्ताओं और प्रस्तुतियों को प्रभावी ढंग से जोड़ा। अपने संबोधन में डॉ. जतिन्दर परवाज़ ने विभाजन की त्रासदी से जुड़े अपने पारिवारिक अनुभव साझा करते हुए बताया कि उनके माता-पिता ने भी विभाजन के दौरान उस भयावह दौर की पीड़ा और विस्थापन को भोगा था। उन्होंने कहा कि विभाजन की स्मृतियां केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अनेक परिवारों की व्यक्तिगत और पीढ़ियों तक चली आ रही स्मृतियों का हिस्सा हैं।
इस अवसर पर डॉ. एम. एम. जुनेजा, आर. पी. मल्होत्रा, सुभाष जुनेजा, सुनील ठुकराल, रेनू चावला, डॉ. विजेंद्र कुमार, जतिंदर सिंह, प्रतिभा वर्मा, मनीषा नांदल, एस. ए. हन्नान, शम्स तबरेज़ी, संजय कुमार तथा अनेक विद्वान एवं साहित्यकार उपस्थित रहे।



