पंजाब में हास्य-व्यंग्य की समृद्ध परंपरा रही है : प्रेम विज
पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य पर विशेष व्याख्यान आयोजित

Chandigarh 10.9.26
चण्डीगढ़ : हिंदी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर की ओर से हिंदी पखवाड़े के अंतर्गत ‘पंजाब का हास्य-व्यंग्य साहित्य : विसंगतियों के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध’ विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। विशेष अतिथि के रूप में डॉ जी एस बाजवा उपस्थित रहे।

विषय विशेषज्ञ के रूप में लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार प्रेम विज ने अपने विचार प्रस्तुत किए।
कार्यक्रम के आरंभ में विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में साहित्यकार प्रेम विज का महत्वपूर्ण योगदान है। वे अब तक 26 पुस्तकों के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध कर चुके हैं, जिनमें हास्य-व्यंग्य की दो पुस्तकें भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हास्य-व्यंग्य एक कठिन और चुनौतीपूर्ण साहित्यिक विधा है, लेकिन पंजाब का इस विधा के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। होंडा ने कहा कि विश्वविद्यालय के ज्यूडिशरी आफ कपिल कुलपति प्रसाद करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व को प्रेरणा से हिंदी विभाग निरंतर साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन कर रहा है

पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य पर विस्तार से चर्चा करते हुए प्रेम विज ने कहा कि पंजाब में हास्य-व्यंग्य की परंपरा प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है। राजाओं के दरबारों में विदूषकों की उपस्थिति इसका एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। लोकगीतों, बोलियों, कहावतों, लोक-परंपराओं और साहित्य में हास्य-व्यंग्य के विविध रूप सहज रूप से दिखाई देते हैं।

उन्होंने कहा कि हास्य और व्यंग्य साहित्य की दो महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली विधाएं हैं। दोनों का संबंध जीवन की विसंगतियों, मानवीय कमजोरियों और सामाजिक परिस्थितियों से है, किंतु दोनों की अभिव्यक्ति और उद्देश्य में अंतर है। हास्य जहां मनुष्य के चेहरे पर मुस्कान लाता है, वहीं व्यंग्य उसे आत्ममंथन और सामाजिक चिंतन के लिए प्रेरित करता है। श्रेष्ठ व्यंग्य केवल हंसाता नहीं, बल्कि व्यवस्था और समाज की विसंगतियों पर प्रश्न भी खड़े करता है।
प्रेम विज ने पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य को समृद्ध करने वाले प्रमुख साहित्यकारों में डॉ. संसार चंद्र, डॉ. इंद्रनाथ मदान, डॉ. चंद्रशेखर, सुरेश सेठ, फकीर चंद शुक्ला और दीपक जालंधरी आदि का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन साहित्यकारों की रचनाओं में हास्य केवल हंसी पैदा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि उसके पीछे सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और सुधार की भावना भी दिखाई देती है।
उन्होंने वर्तमान हास्य-व्यंग्य लेखन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यंग्यकार के लिए कटुता और व्यक्तिगत आक्षेप से बचना, विषय का उचित चुनाव करना, भाषा की गरिमा बनाए रखना तथा हास्य की मर्यादा का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। व्यंग्य जितना प्रभावशाली हो, उतना ही संयमित और रचनात्मक भी होना चाहिए।
इस अवसर पर जालंधर से पधारीं प्रसिद्ध लेखिका डॉ. सरला भारद्वाज ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी मुकेश कुमार ने किया।
कार्यक्रम के अंत में विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने प्रेम विज को अंगवस्त्र एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया।

