डेयरी उद्योग से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ चण्डीगढ़ के युवा सड़कों पर उतरे

डेयरी उद्योग से हो रहे पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ चण्डीगढ़ के युवा सड़कों पर उतरे
सुखना झील पर प्रदर्शन कर डेयरी और गोमांस उद्योग के संबंध पर उठाए सवाल
चण्डीगढ़ : बढ़ती गर्मी, जल संकट और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच चंडीगढ़ के युवा डेयरी उद्योग से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। शहर के सुखना झील पर युवा कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक प्रदर्शन कर डेयरी उद्योग के पर्यावरणीय प्रभाव और गोमांस उद्योग से उसके संबंध को उजागर किया। ये अभियान पशु कल्याण संगठन पीडूज़ पीपल की अगुआई में चलाया गया, जो कुत्तों की नसबंदी, घोड़ों के कल्याण, डेयरी उद्योग में क्रूरता की रोकथाम तथा वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में कार्य करता है। पशु अधिकार कार्यकर्ता एवं पीडूज़ पीपल के संचालक साहिल वर्मा ने उक्त जानकारी देते हुए बताया कि यह अभियान देशभर के 20 शहरों में चलाया जा रहा है, जहां युवा लोगों को यह समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि दूध और गोमांस दोनों एक ही पशु प्रणाली से जुड़े हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने लोगों से डेयरी उद्योग में जानवरों की स्थिति और बाद में उनके गोमांस आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने पर विचार करने की अपील की।

कार्यकर्ताओं ने बताया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और डेयरी उद्योग का पर्यावरण पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि एक लीटर दूध उत्पादन में लगभग 1,078 लीटर पानी खर्च होता है, जबकि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पहले से ही भूजल संकट बना हुआ है।
प्रदर्शन के दौरान यह भी कहा गया कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने डेयरी और बूचड़खानों को “रेड कैटेगरी” में रखा है, जो सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों में गिने जाते हैं। इसके अलावा पशुधन से निकलने वाली मीथेन गैस को जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण बताया गया।
पशु अधिकार कार्यकर्ता साहिल वर्मा ने कहा कि चंडीगढ़ को स्वच्छ और सुनियोजित शहर माना जाता है, लेकिन खाद्य प्रणालियों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान पर बहुत कम चर्चा होती है। उन्होंने कहा कि बढ़ते तापमान और जल संकट को देखते हुए डेयरी उद्योग के प्रभाव पर सार्वजनिक चर्चा जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि नीति निर्माता, संस्थान और उद्योग यह सोचें कि भारत की खाद्य प्रणालियां जलवायु और नैतिक चुनौतियों का सामना कैसे करेंगी।
इस अभियान के तहत सोशल मीडिया पर भी डेयरी उद्योग और पशु कल्याण से जुड़े मुद्दों को उठाया जा रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि लोगों को भोजन और पर्यावरण के बीच संबंध को समझने की जरूरत है।



