उच्च शिक्षा निदेशक, चण्डीगढ़ ने डीएवी कॉलेज के सूरज नारायण के चयन एवं पदोन्नति मामले में मामले में पंजाब विश्वविद्यालय से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी

उच्च शिक्षा निदेशक, चण्डीगढ़ ने डीएवी कॉलेज के सूरज नारायण के चयन एवं पदोन्नति मामले में मामले में पंजाब विश्वविद्यालय से कार्रवाई रिपोर्ट मांगी
चण्डीगढ़ : उच्च शिक्षा निदेशालय (डीएचई), चण्डीगढ़ ने पंजाब विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार से सूरज नारायण के चयन एवं पदोन्नति मामले में पंजाब विश्वविद्यालय की सीएएस कमेटी द्वारा इंगित की गई अनियमितताओं पर की गई कार्रवाई व परिणाम की जानकारी मांगी है। उल्लेखनीय है कि सूरज नारायण की नियुक्ति वर्ष 2017 में निजी-सहायता प्राप्त डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में इतिहास विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर हुई थी तथा उन्होंने वर्ष 2024 में पदोन्नति हेतु आवेदन किया था।
आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. राजेंद्र के. सिंगला ने इस मामले में पहले ही चंडीगढ़ प्रशासन के मुख्य सचिव को 1 फ़रवरी 2026 को शिकायत भेजकर उक्त अभ्यर्थी की पात्रता में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया था । डॉ. सिंगला ने यह प्रश्न उठाया कि यदि अभ्यर्थी की पात्रता संदिग्ध थी तथा विश्वविद्यालय की सीएएस कमेटी द्वारा अनियमितताएं उजागर की जा चुकी थीं, तो फिर 2017 से लगातार 95% सरकारी अनुदान (ग्रांट-इन-ऐड) कैसे जारी किया जाता रहा।
डॉ. सिंगला ने यह भी कहा कि पंजाब सरकार की ग्रांट-इन-एड नीति, जिसे यूटी चंडीगढ़ द्वारा भी अपनाया गया है, स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि यदि कोई सहायता प्राप्त कॉलेज सरकार/यूजीसी/विश्वविद्यालय के नियमों व मानकों का पालन नहीं करता, तो उच्च शिक्षा निदेशालय को अधिकार है कि वह अनुदान रोक सकता है, घटा सकता है, निलंबित कर सकता है अथवा वापस ले सकता है।
हालांकि, इस मामले में कथित रूप से गंभीर अनियमितताओं के बावजूद अनुदान बिना किसी बाधा के जारी रहा, जिससे जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं तथा यूजीसी विनियमों के अनुपालन को लेकर भी चिंता उत्पन्न होती है। डॉ. सिंगला ने कहा कि कथित रूप से अयोग्य अभ्यर्थी द्वारा छात्रों को पढ़ाना, देशभर में उच्च शिक्षा संस्थानों में शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने हेतु बनाए गए यूजीसी नियमों का गंभीर उल्लंघन है।
डॉ. सिंगला ने यह भी आरोप लगाया कि यह मामला पिछले कई महीनों से पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति कार्यालय तथा डीसीडीसी कार्यालय में बिना किसी कार्रवाई के लंबित पड़ा है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन शायद इसलिए गंभीर नहीं है क्योंकि यह धन उनके निजी खजाने से नहीं बल्कि करदाताओं की जेब से जा रहा है। उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि उच्च शिक्षा निदेशालय, जो इस प्रकार की अनियमितताओं पर कार्रवाई करने हेतु बाध्य है, इतने समय तक मौन क्यों रहा।
उन्होंने आशा जताई कि उच्च शिक्षा निदेशालय द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के बाद अब पंजाब विश्वविद्यालय प्रशासन को मामले में शीघ्र कार्रवाई करनी पड़ेगी, अन्यथा सार्वजनिक धन तथा शैक्षणिक मानकों से जुड़े इस गंभीर प्रकरण में जानबूझकर देरी करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।



