संस्कार भारती एवं प्राचीन कला केन्द्र ने किया ‘कला गुरु सम्मान’ समारोह का आयोजन

यूं ही नहीं बनते कला गुरु,
मुकम्मल शज़र बनना पड़ता है…
संस्कार भारती एवं प्राचीन कला केन्द्र ने किया ‘कला गुरु सम्मान’ समारोह का आयोजन
चण्डीगढ़ : संस्कार भारती की चंडीगढ़ इकाई एवं प्राचीन कला केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आज ‘कला गुरु सम्मान’ समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज के निदेशक एवं वरिष्ठ रंगकर्मी सुदेश शर्मा को नाट्य कला के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान एवं उपलब्धियों के लिए ‘कला गुरु सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
संस्कार भारती की चंडीगढ़ इकाई की चयन समिति द्वारा नाट्य एवं रंगमंच के क्षेत्र में सुदेश शर्मा की दीर्घकालीन सेवाओं, उपलब्धियों और उनके शिष्यों के निर्माण में योगदान को देखते हुए इस वर्ष के ‘कला गुरु सम्मान’ के लिए उनका चयन किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात संस्कार भारती का ध्येय गीत “साधयति संस्कार भारती भारते नवजीवनम्” प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम के दौरान दो नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुति भी दी गई, जिनका विषय मां भारती और राष्ट्रभक्ति रहा। कलाकारों ने इन प्रस्तुतियों के माध्यम से हर घर तिरंगा फहराने का आह्वान किया।

नुक्कड़ नाटकों की प्रस्तुति के पश्चात सुदेश शर्मा के शिष्यों ने गुरु परंपरा का निर्वहन करते हुए उनके चरण धोकर उनका आशीर्वाद लिया तथा माल्यार्पण किया। संस्कार भारती की चंडीगढ़ इकाई की ओर से उन्हें पुष्पगुच्छ भेंट किया गया। इसके बाद शॉल ओढ़ाकर तथा ‘कला गुरु सम्मान प्रशस्ति पत्र’ प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया गया।
समारोह में शहर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों एवं कला, साहित्य और संस्कृति से जुड़े विशिष्ट लोगों ने उपस्थित होकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस अवसर पर संस्कार भारती चंडीगढ़ के मार्गदर्शक प्रो. सौभाग्य वर्धन, अध्यक्ष यशपाल, डॉ. अनीश गर्ग, उपाध्यक्ष, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, डॉ. समीरा कौसर, निदेशक, प्राचीन कला केन्द्र, प्रसिद्ध रंगकर्मी राजेश आत्रेय, ख्याति प्राप्त भांगड़ा गुरु बलकार सिद्धू तथा पंजाबी फिल्म जगत के कलाकार बन्नी ने सुदेश शर्मा के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनके साथ जुड़ी अपनी स्मृतियों को साझा किया।
प्रो. सौभाग्य वर्धन ने श्री सुदेश शर्मा की जीवन यात्रा और रंगमंच के क्षेत्र में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने न केवल स्वयं रंगमंच को समृद्ध किया, बल्कि अनेक प्रतिभाओं को संस्कारित कर उन्हें कला के क्षेत्र में आगे बढ़ने का मार्ग भी दिखाया।
इस अवसर पर डॉ. अनीश गर्ग ने अपनी काव्यात्मक शैली में गुरु की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा:

“यूं ही नहीं बनते कला गुरु,
मुकम्मल शज़र बनना पड़ता है…
घर बचाने को परिंदों का,
प्रचंड आंधियों में तनना पड़ता है…
हर कदम पर हो जीत उसके शागिर्दों की,
तुम क्या जानो स्वयं से कितनी बार लड़ना पड़ता है…”
सम्मान से अभिभूत सुदेश शर्मा ने कहा कि अपने शहर और अपने लोगों के बीच यह सम्मान प्राप्त करना उनके लिए अत्यंत गौरव और भावुकता का क्षण है। उन्होंने कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं है, बल्कि उन सभी सहकर्मियों, कलाकारों और शिष्यों का सम्मान है, जिन्होंने उनके साथ मिलकर कला के क्षेत्र में अपना खून-पसीना एक किया है। उन्होंने अपने शिष्यों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
समारोह का समापन राष्ट्रगान के स्थान पर ‘वंदे मातरम्’ के सामूहिक गायन के साथ हुआ।



