श्री गुरु तेग बहादुर जी का सर्वोच्च बलिदान सम्पूर्ण मानवता के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत है : डॉ. सरबजीत सिंह

श्री गुरु तेग बहादुर जी का सर्वोच्च बलिदान सम्पूर्ण मानवता के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत है : डॉ. सरबजीत सिंह
श्री गुरु तेग बहादुर जी का अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी समझा जाना चाहिए : डॉ. मनमोहन सिंह
एमसीएम में श्री गुरु तेग बहादुर जी के योगदान पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
चण्डीगढ़ : मेहर चंद महाजन डीएवी कॉलेज फॉर वूमेन ने ‘भारतीय संस्कृति, साहित्य और मानवता में श्री गुरु तेग बहादुर जी का योगदान’ विषय पर एक दिवसीय अंतर्विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी में प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, विद्वानों और विद्यार्थियों ने भाग लेकर सिखों के नौवें गुरु की महान विरासत तथा भारतीय संस्कृति, साहित्य और मानवीय मूल्यों में उनके अमूल्य योगदान पर विचार-विमर्श किया।
उद्घाटन सत्र में शिक्षा एवं साहित्य जगत की अनेक विशिष्ट हस्तियाँ उपस्थित रहीं। पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना के अध्यक्ष डॉ. सरबजीत सिंह विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम का शुभारंभ श्री गुरु तेग बहादुर जी की वाणी से प्रेरित भावपूर्ण शबद-गायन से हुआ।
मुख्य वक्ता के रूप में भाषा विभाग, पंजाब के निदेशक एस. जसवंत सिंह ज़फ़र ने अपने संबोधन में गुरु तेग बहादुर जी की महानता और उनके अहंकार-रहित व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने इस प्रसंग का उल्लेख किया कि जब उनके पिता गुरु हरगोबिंद जी के पश्चात उन्हें गुरुगद्दी नहीं मिली, तब भी उन्होंने अत्यंत विनम्रता और धैर्य का परिचय दिया। उन्होंने गुरु जी को सांस्कृतिक संरक्षण का प्रतीक बताते हुए उस समय की आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों के बीच उनकी व्यापक स्वीकार्यता का भी उल्लेख किया। पंडित कृपा राम के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु जी के प्रेम और करुणा ने वह कार्य कर दिखाया जो औरंगज़ेब की तलवार नहीं कर सकी।
अध्यक्षीय संबोधन में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के चेयरमैन डॉ. मनमोहन सिंह ने गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की ऐतिहासिक और समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु जी का अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि आर्थिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भी समझा जाना चाहिए।
डॉ. सरबजीत सिंह ने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी के व्यक्तित्व को समझने के लिए पहले गुरमत परंपरा को समझना आवश्यक है, जिसके वे अभिन्न अंग हैं। उन्होंने दूसरों के लिए दिए गए गुरु जी के बलिदान को इतिहास की एक अद्वितीय घटना बताते हुए कहा कि उनकी वाणी अमानवीयता से पीड़ित समाज को मानवीय बनाने की प्रेरणा देती है। उनका यह सर्वोच्च बलिदान सम्पूर्ण मानवता के लिए निरंतर प्रेरणा का स्रोत है।
शैक्षणिक सत्र में अनेक विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए, जिनमें पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के पंजाबी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परमजीत कौर सिद्धू; गवर्नमेंट कॉलेज, सेक्टर-11, चंडीगढ़ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गुरमेल सिंह; पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज, सेक्टर-46, चंडीगढ़ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. बलजीत सिंह; पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज, सेक्टर-11, चंडीगढ़ के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. परमजीत सिंह; तथा पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. विनोद बिश्नोई शामिल थे। वक्ताओं ने गुरु तेग बहादुर जी के जीवन और शिक्षाओं के ऐतिहासिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक महत्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उनकी समकालीन प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
समापन सत्र में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के गुरु नानक सिख अध्ययन विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. जसपाल कौर कंग मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। इस अवसर पर चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ. अनीश गर्ग तथा सचिव डॉ. सुभाष भास्कर विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए। डॉ. जसपाल कौर कंग ने गुरु गोबिंद सिंह जी की वाणी का उद्धरण देते हुए गुरु तेग बहादुर जी की महानता और उनके विशिष्ट बलिदान पर प्रकाश डाला। कश्मीरी पंडितों की रक्षा करते हुए गुरु तेग बहादुर जी द्वारा दिए गए ‘अभयदान’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने गुरु जी के दूरदर्शी नेतृत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी शहादत के अनेक आयाम हैं।
समापन व्याख्यान पंजाब विश्वविद्यालय के गुरु नानक सिख अध्ययन विभाग के अकादमिक इंचार्ज डॉ. गुरपाल सिंह संधू ने दिया, जिसमें उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी द्वारा प्रतिपादित साहस, बलिदान, समावेशिता और धार्मिक स्वतंत्रता जैसे सार्वभौमिक मूल्यों को उजागर किया।
कार्यवाहक प्राचार्या श्रीमती नीना शर्मा ने कहा कि सम्पूर्ण मानवता श्री गुरु तेग बहादुर जी की महान विरासत और मानव कल्याण के लिए दिए गए उनके सर्वोच्च बलिदान के प्रति नतमस्तक है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजन गुरु जी की शिक्षाओं में आस्था को सुदृढ़ करने और समकालीन समय में उनकी निरंतर प्रासंगिकता को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।



