पुराणाचार्य स्वामी डॉ रमनीक कृष्ण जी महाराज ने सुनाई चंचुला और बिंदुक की कथा

पुराणाचार्य स्वामी डॉ रमनीक कृष्ण जी महाराज ने सुनाई चंचुला और बिंदुक की कथा

चण्डीगढ़ : पावन पुरुषोत्तम मास के अवसर पर श्रीसत्यनारायण मंदिर सेक्टर 22सी चंडीगढ़ में आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा के द्वितीय दिवस में सद्भावना दूत पुराणाचार्य स्वामी डॉ रमनीक कृष्ण जी महाराज ने श्री शिव महापुराण में वर्णित चंचुला और बिंदुक की कथा सुनाते हुए कहा कि ये एक अत्यंत प्रेरणादायक प्रसंग है, जो बताती है कि सच्ची भक्ति और सत्संग के प्रभाव से घोर पापी भी पापमुक्त हो जाते हैंचंचूला की कथा श्रवण करवाते हुए कहा कि कुजनो के निवास स्थान उस वाष्कल नामक ग्राम में किसी समय एक बिंदुग नामधारी ब्राह्मण रहता था, वह बड़ा अधम था।

वह दुरात्मा महापापी था यद्यपि उसकी स्त्री बड़ी सुंदर थी उसकी पत्नी का नाम चाँपावन एक पतिव्रता स्त्री थी सदा धर्म में लगी रहती थी और बहुत सुंदर थी किंतु उसका पति कुमार्ग गामी था। उसका पति बिन्दुग सदा कुमार्ग मार्ग और वेश्याओं के संसर्ग में रहने लगा। बहुत समय बीतने पर उसकी स्त्री चंचूला काम से पीड़ित होने पर भी स्वधर्म नाश के भय से क्लेश सहकर भी दीर्घकाल तक धर्म से भ्रष्ट नहीं हुई, परंतु दुराचारी पति के आचरण से प्रभावित होने के कारण कामपीड़ित होकर आगे चलकर वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गई। वह रात्रि में चोरी छिपे पर पुरुषों से मिलने जाती थी व अन्य पुरुषों के साथ रमण करने लगी। एक बार उसको उसके पति ने किसी अन्य पुरुष के साथ उसको गलत कार्य में सलंग्न देखा। ओर बुरा करने के लिए प्रेरित किया। कर्मों के फल ने बिन्दुग की दुर्गती की जिसके परिणामस्वरूप वो विंध्याचल पर्वत का राक्षस बना। सत्य ही बुरे का फल बुरा ही होता है।
पाप करते हुए बिंदुक की अकाल मृत्यु हो गई। अपने कुकर्मों के कारण उसे भयानक नरक और प्रेत योनि (पिशाच) प्राप्त हुई। वह विंध्याचल पर्वत पर एक भयानक पिशाच के रूप में भटकने लगा और अत्यधिक कष्ट भोगने लगा। पति की मृत्यु के बाद चंचुला एकांत में रहने लगी。 एक दिन उसे अपनी स्थिति पर पछतावा हुआ और वह एक संत की शरण में गई। संत ने उसे शिव महापुराण की महिमा बताई और कथा सुनने की प्रेरणा दी। चंचुला ने पूरी निष्ठा से शिव महापुराण का श्रवण किया और व्रत-उपवास किए。 इस पुण्य के प्रभाव से उसका अंतःकरण शुद्ध हो गया और मृत्यु के पश्चात वह सीधे शिवलोक (कैलाश) पहुँच गई। कैलाश पहुँचने पर भी चंचुला को अपने पति के पिशाच योनि में भटकने का ध्यान आया। उसने माता पार्वती से अपने पति की मुक्ति की प्रार्थना की。 माता पार्वती की आज्ञा से गंधर्व तुम्बुरु विंध्याचल पर्वत गए और उन्होंने पिशाच बने बिंदुक को शिव महापुराण की कथा सुनाई。 इस कथा के प्रभाव से बिंदुक के सारे पाप धुल गए और वह पिशाच योनि से मुक्त होकर अपनी पत्नी चंचुला के पास शिव धाम पहुंच गया। उन्होंने बताया कि यह कथा दर्शाती है कि शिव महापुराण का श्रवण और भगवान शिव की शरण मनुष्य को सभी सांसारिक बंधनों और पापों से मुक्त कर देती है।



