दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश : डॉ. करम चन्द
मिट्टी के दीयों से मन के उजाले तक का सफर ही दीपावली का वास्तविक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ


चंडीगढ़। दीपावली केवल अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा, सामाजिक समरसता और मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने का पर्व है। यह त्योहार हमें अपने भीतर झांकने, रिश्तों को संवारने, जरूरतमंदों की सहायता करने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा देता है। यह विचार डॉ. करम चन्द, भूतपूर्व प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला घरेड़, जिला सोलन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम संयोजक, हिमाचल महासभा (पंजीकृत), चंडीगढ़ ने अपने विशेष आलेख में व्यक्त किए।
डॉ. करम चन्द ने कहा कि दीपावली का वास्तविक संदेश केवल घरों की देहरी पर दीप जलाने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि मन के भीतर बसे अहंकार, लोभ, क्रोध और ईर्ष्या जैसे अंधकार को भी दूर करने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी का प्रसंग न्याय, मर्यादा और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि मिट्टी का दीपक भारतीय संस्कृति का अत्यंत सुंदर प्रतीक है। मिट्टी हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने, तेल निरंतरता और बाती समर्पण का संदेश देती है। दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है। इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी तभी सार्थक है, जब उसका ज्ञान, व्यवहार और संवेदना दूसरों के जीवन में खुशियां और आशा का संचार करें।

उन्होंने दीपावली पर स्थानीय कुम्हारों और मिट्टी के दीपक बनाने वाले कारीगरों से खरीदारी करने की अपील करते हुए कहा कि इससे पारंपरिक कला, स्वदेशी भावना और छोटे कारीगरों की आजीविका को प्रोत्साहन मिलेगा।
पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पटाखों से उत्पन्न वायु एवं ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और पशु-पक्षियों पर भी पड़ता है। इसलिए मिट्टी के दीपक जलाने, अनावश्यक पटाखों से बचने, प्लास्टिक का कम उपयोग करने तथा स्वच्छता बनाए रखने वाली पर्यावरण अनुकूल दीपावली मनाने की आवश्यकता है।
डॉ. करम चन्द ने कहा कि दीपावली का उत्सव तभी पूर्ण होगा, जब समाज के जरूरतमंद परिवारों, गरीब बच्चों, अकेले बुजुर्गों और श्रमिक वर्ग तक भी खुशियों का प्रकाश पहुंचे। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और शिक्षा में सहयोग देना भी दीपावली मनाने का एक सार्थक तरीका है।
उन्होंने महिलाओं के सम्मान, समान अधिकार, पारिवारिक जिम्मेदारियों में सहभागिता, सामाजिक समरसता और नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति एवं परंपराओं से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
अपने संदेश में उन्होंने कहा कि एक दीप से दूसरा दीप जलाने पर पहले दीप का प्रकाश कम नहीं होता, बल्कि उजाला बढ़ता है। इसी प्रकार प्रेम, ज्ञान और सहयोग बांटने से समाज अधिक समृद्ध बनता है।
अंत में उन्होंने सभी देशवासियों से आह्वान किया कि इस दीपावली केवल घरों को ही नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और संबंधों को भी प्रकाशित करें तथा एक संवेदनशील, स्वच्छ, समरस और मानवीय समाज के निर्माण का संकल्प लें।
शुभ दीपावली!



