अच्छे लेखक के साथ अच्छा इंसान होना भी जरूरी है : डॉ. शशि प्रभा

चण्डीगढ़ : वरिष्ठ लेखिका डॉ. शशि प्रभा ने अपने निवास स्थान सैक्टर 40 में उनके साथ समय बिताने और सुनने- सुनाने के लिए आए साहित्यकारों से बातचीत में कहा कि वह विगत कई महीनों से पीठ दर्द के कारण बिस्तर पर रही, लेकिन इस समय के दौरान बहुत कम लेखक उनसे मिलने आए। डॉ. शशि प्रभा ने कहा कि अच्छा लेखक होने के साथ-साथ अच्छा इंसान होना भी जरूरी है। हमें लेखन के साथ-साथ अपने साथी साहित्यकारों से भी मेलजोल रखना चाहिए। साहित्य हमें श्रेष्ठ सामाजिक प्राणी बनाना सीखता है।

संवाद साहित्य मंच के लेखक सुभाष भास्कर, प्रेम विज, डॉ दलजीत कौर, डॉ रेखा मित्तल, डॉ संगीता शर्मा कुंद्रा, आर के भगत, परमजीत परम, ललिता पुरी, राज विज, सत्येन्द्र कौर गिल आदि उन्हें मिलने गए थे।
डॉ शशि प्रभा ने अपनी रचना प्रक्रिया की बात करते हुए बताया कि उन्होंने 35 वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया। तब मैंने जीवन और समाज को खुली आंख से देखा। लेखन के प्रति मेरा रुझान बीए में शुरू हो गया था। मैंने पीएचडी भी की। कैंसर का भी मुकाबला किया। अकेले रहकर जिंदगी गुजारने का भी फैसला लिया, हालांकि य ज्यादा सुखद नहीं रहा। उन्होंने अपनी प्रिय कहानी ‘निरंजन दास का बेटा’ का पाठन किया। इस कहानी में बताया गया कि किस तरह से मां-बाप अपनी पसंद बच्चों पर थोप कर उनका जीवन बर्बाद कर देते हैं। इस कहानी में व्यंग्य का भी पुट मिला। पिता खुद तो ऑफिस की परीक्षा पास नहीं कर पाए, लेकिन बेटे को डॉक्टर बनने के लिए दबाव डालते रहे। इस अवसर पर चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के सचिव सुभाष भास्कर और मंच के अध्यक्ष प्रेम विज ने डॉ शशि प्रभा को शाल प्रदान कर उनका सम्मान भी किया।
इस अवसर पर उपस्थित कवियों ने भी अपनी रचनाएं प्रस्तुत की। डॉ रेखा मित्तल ने अपनी कविता में यूं कहा- कुछ वक्त रही मैं मां के साथ/ अब मां रहती हमेशा मेरे साथ। सुभाष भास्कर ने कविता में कहा कि आदिकाल से ही चल रहा है अंतर्द्वंद्व/आकाश में पाताल में पर्वतों में समुद्र में। प्रेम विजय ने सच्चा साथी में बताया- बिना किसी रिश्ते के जो/दिल के सबसे पास होता है। डॉ. दलजीत कौर ने कविता में कहा – ठूँठ होने लगा होगा पेड़/ धीरे-धीरे महसूसती हूं मैं / कुछ ऐसा ही तुम्हारे जाने के बाद पिता। आर भगत ने कहा- चल यार हम एक दूजे को पत्थर मारते हैं/ जिंदगी के हसीन पल बेरुखी में गुजरते हैं। डॉ संगीता शर्मा कुंद्रा गीत ने फरमाया- गम से दूर कर दे जिंदगी मुझे /खुशियों से भरा देखना चाहता हूं तुझे। सतिंद्र कौर गिल ने कविता में कहा- मेरे भीतर मुझे सहदेव दो मैं ही दिखते / दोनों की ही अलग कहानी अलग किरदार है लिखते। परमजीत परम ने पंजाबी गज़ल में कहा- उदास पलां च बन्द करके पलकां/ खामोशी दा कोई गीत गाया जा सकदा।



