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ज़रूरी तो नहीं माशूका की हर बात पर लिखना, कभी शहीद की माँ पर भी किताब लिखा करो…

यूँ ना मोहब्बत पर बेहिसाब लिखा करो, अपनी कलम से कह दो, इंकलाब लिखा करो।”

ज़रूरी तो नहीं माशूका की हर बात पर लिखना, कभी शहीद की माँ पर भी किताब लिखा करो…

यूँ ना मोहब्बत पर बेहिसाब लिखा करो, अपनी कलम से कह दो, इंकलाब लिखा करो।”

 

 

चण्डीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित पंचभाषीय कवि दरबार

चण्डीगढ़ : चण्डीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा आज रानी लक्ष्मी बाई भवन, सेक्टर 38 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कवि दरबार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य अतिथि नवीन रत्तू, डायरेक्टर, सांस्कृतिक विभाग, चण्डीगढ़ रहे।

इस कवि दरबार में पाँच भाषाओं पंजाबी, हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू और संस्कृत के कवियों ने भाग लिया।

सबसे पहले साहित्य अकादमी के चेयरमैन, प्रसिद्ध लेखक डॉ. मनमोहन ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्य अकादमी का उद्देश्य चंडीगढ़ के साहित्यकारों को मंच प्रदान करना है, चाहे वे किसी भी भाषा में सृजन करते हों।

पांच अलग-अलग भाषाओं के कवियों का एक मंच पर आना न केवल हमारी भाषाई विविधता, बल्कि हमारी सांस्कृतिक एकता और साहित्यिक समृद्धि का भी प्रतीक है।

इसके पश्चात कवि दरबार का आगाज़ हुआ। इस अवसर पर अकादमी के उपाध्यक्ष डॉ अनीश गर्ग एवं सचिव सुभाष भास्कर उपस्थित रहे। सबसे पहले युवा पंजाबी कवि सुरख़ाब ने अपनी कविताओं का पाठ किया।

इसके बाद उर्दू कवि सनी कबीर ने अपने खूबसूरत शेर

“झूठ बोलता हूँ मैं, कैसा आईना हूँ मैं,

जब से उसको देखा है, तब से लापता हूँ मैं।”

सुनाकर समां बाँध दिया।

कवि दरबार के अगले कवि संस्कृत भाषा के ओमनदीप थे। उन्होंने भावपूर्ण कविता “जय जय भारतम्” प्रस्तुत कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

अगली कवयित्री हिंदी की बबीता कपूर थीं। उन्होंने अपनी ग़ज़ल

“अपनी खिड़कियाँ सारी की सारी खोलकर सोचती हूँ आज़ाद हूँ,

जिसके गुम होने से गुमसुम सभी, मैं उसी किरदार की आवाज़ हूँ।”

सुनाई।

युवा उर्दू शायर शमशेर साहिल ने अपने कलाम

“रंगत चुरा के ले गई गुल से नई फ़ज़ा,

कैसा अजीब दौर है, बच्चे उदास हैं” से श्रोताओं को प्रभावित किया।

पंजाबी शायर संदीप सिंह ने ग़ज़ल प्रस्तुत की

“ऐस तिलिस्मी गलबकड़ी से आखिर को जी भरिया है,

तैथों हाथ छुड़ा के मेला देखण नूं जी करिया है।”

जिसे श्रोताओं की ओर से भरपूर दाद मिली।

उर्दू के बेहतरीन शायर जतिंदर परवाज़ की ग़ज़ल के खूबसूरत बोल थे “सहमा सहमा हर एक चेहरा, मंज़र मंज़र ख़ून में तर,

शहर से जंगल ही अच्छा है, चल चिड़िया तू अपने घर।

अख़बारों में खूनी मंज़र मत छापो, बच्चे इन तस्वीरों से डर जाते हैं।”

समारोह की अगली कड़ी में संदीप शर्मा ने अपनी आज़ाद नज़्म “मुझे काहल नहीं कोई,

ना ज़िद है,

मैं समय से आगे नहीं लंघना,

ना साथ साथ चलना।

मैं तो पीछे रहकर ही पहुँचूँगा,

गाहे हुए राहों की ख़ुशबू

साथ लेकर”सुनाकर भरपूर दाद हासिल की।

हिंदी के वरिष्ठ कवि विजय कपूर ने कहा “मैं विचार नहीं,

विचारों को जन्म देने वाला आकाश हूँ; मैं देह नहीं,

देह में धड़कती हुई वह ऊर्जा हूँ,

जो स्वयं प्रकाश है।”

इसके बाद पंजाबी ग़ज़लकार मनजीत पुरी की बारी थी। उनकी ग़ज़लों “यात्रा हमारी उदासी इसलिए न बन सकी,

चलने लगे तो घरों को साथ साथ ले लेते थे”और

“मेरी दीवानगी की शिखर भी बस होने वाली है, तुम बस अपनी मर्ज़ी के पत्थर भाल के रखो।” ने माहौल को विचारमग्न बना दिया।

अंग्रेज़ी की कवयित्री सुनीत मदान ने अपनी कविता “आई हैव अ डेड फिश इन माय हार्ट / इट वॉज़ बर्न्ड / फ्लुएंट इन द ग्रामर” प्रस्तुत कर अपने हुनर का लोहा मनवाया।

प्रेम विज ने कहा,”आजादी कैसे मिली जलियांवाला बाग की,

उन खामोश दीवारों से‌ पूछो

जिन्होंने गोलीयों की

बरसात देखी थी”

पंजाबी शायर जगदीप सिद्धू ने “वाह ताज़” तथा “मेरा बच्चा” कविताएँ सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर किया।

हिंदी कवि सुदेश मोदगिल ने “भारत माता की ज़ंजीरों को जिन वीरों ने” तथा उर्दू शायर मुसव्विर फ़िरोज़पुरी ने “दोनों ने ही खो दिए हैं ज़र, ज़मीं, अहबाब, रिश्ते” सुनाकर खूब रंग जमाया।

लुधियाना से आए उर्दू के प्रसिद्ध शायर मुकेश आलम ने

“रेगज़ारों में समंदर की कहानी सुनकर, प्यास इतनी थी कि हम रो पड़े पानी सुनकर।”

सुनाकर कवि दरबार को एक शानदार मुकाम तक पहुँचाया।

हिंदी कवयित्री शिप्रा श्रीवास्तव ने “आसमान से आज ऐसी बारिश हुई”, पंजाबी कवि मक्खण मान ने “वह मेरे कोल इ’व आऊंदी जिवें”, स्वर्णजीत सवी ने “पल भर के लिए संतूर उदास हो गया”, मनजीत पाल सिंह ने “पानी बन कंड्या विचकार” तथा महेश्वर सिंह ने “शायर की जात हूँ” सुनाकर महफ़िल को शिखर तक पहुँचाया।

अंत में उर्दू के प्रसिद्ध शायर शम्स तबरेज़ी ने “क्या कहूँ, कितनी बेकरारी है, आँखों आँखों में शब गुज़ारी है।”

सुनाकर कवि दरबार को खूबसूरत अंजाम तक पहुँचाया।

शमशेर साहिल ने पढ़ा,

“इश्क़ में जान लगा सकता हूँ मैं भी लेकिन, मैं अकेला हूँ मेरे घर में कमाने वाला”,

इस कवि दरबार की विशेषता यह रही कि इसमें हिंदी, उर्दू और पंजाबी के वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित शायरों सत्यपाल सहगल, गुरदीप गुल और सुरिंदर गिल को सम्मानित किया गया।

डॉ. अनीश गर्ग, उपाध्यक्ष, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी ने अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आज सभी कवियों ने इस बहुभाषी कवि दरबार में अपनी अपनी भाषा और शब्दों के रंगों से एक खूबसूरत तिरंगा बना दिया है। उन्होंने कहा कि साहित्य केवल प्रेम और सौंदर्य की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि देश, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व को भी शब्द देना चाहिए।

उन्होंने अपने संदेश में कहा:

“ज़रूरी तो नहीं माशूका की हर बात पर लिखना,

कभी शहीद की माँ पर भी किताब लिखा करो।

यूँ ना मोहब्बत पर बेहिसाब लिखा करो,

अपनी कलम से कह दो, इंकलाब लिखा करो।”

Ravinder Popli

House No. 3592, Sector 35 D, Chandigarh 9988293592/9780863592

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