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लोकतंत्र का महापर्व या बच्चों के भविष्य की कीमत? उधार के अमले पर टिकी चुनावी व्यवस्था पर समाजसेवी राजबीर सिंह भारतीय के गंभीर सवाल”

“दफ्तरों और गलियों में भटकते गुरुजी, सूने पड़े ब्लैकबोर्ड: चुनावी व्यवस्था की उधारी नीति से गरीब बच्चों की शिक्षा पर पड़ रही दोहरी मार”

 

“अमीरों के बच्चे निजी स्कूलों में सुरक्षित, गरीबों के गुरुजी चुनावी ड्यूटी में व्यस्त — व्यवस्था की इस असमानता पर कब जागेगा प्रशासन?”

 

“लोकतंत्र का महापर्व या बच्चों के भविष्य की कीमत? उधार के अमले पर टिकी चुनावी व्यवस्था पर समाजसेवी राजबीर सिंह भारतीय के गंभीर सवाल”

 

“दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चाहिए अपनी स्थायी चुनावी व्यवस्था — ताकि चुनाव भी मजबूत हों और बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित रहे”— राजबीर सिंह भारतीय समाजसेवी एवं सेवानिवृत्त सुपरिटेंडेंट,

कार्यालय महाधिवक्ता (AG Office), हरियाणा,

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़।

 

चंडीगढ़, 22 जून 2026

 

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य है। लगभग 150 करोड़ की आबादी और करोड़ों मतदाताओं वाले देश में लोकसभा, विधानसभा, पंचायती राज संस्थाओं और नगर निगम और निकायों के चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया हैं। एक नागरिक अपने मत के माध्यम से देश और प्रदेश के नेतृत्व का चयन करता है। इसलिए चुनाव प्रक्रिया का मजबूत, निष्पक्ष और आधुनिक होना अत्यंत आवश्यक है।

 

लेकिन आजादी के लगभग 80 वर्षों बाद भी एक गंभीर प्रश्न देश के सामने खड़ा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर अन्य सरकारी विभागों के कर्मचारियों और अधिकारियों की अस्थायी तैनाती पर निर्भर क्यों है?

 

उधार के अमले पर टिका चुनावी ढांचा — क्या समय नहीं आया बदलाव का?

भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक और अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था है, जिसकी जिम्मेदारी पूरे देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को संचालित करने की है। लेकिन जमीनी स्तर पर चुनावों के संचालन के लिए शिक्षकों, सरकारी कर्मचारियों, प्रशासनिक अधिकारियों और सुरक्षा बलों को बार-बार उनके मूल कार्यों से हटाकर चुनावी ड्यूटी में लगाया जाता है।

यह व्यवस्था चुनाव प्रक्रिया को पूरा तो करती है, लेकिन इसके साथ-साथ शिक्षा, प्रशासन और जनसेवा के कई क्षेत्रों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।

 

क्लासरूम से गायब और गलियों में भटकते शिक्षक — सबसे बड़ा नुकसान बच्चों का:

शिक्षक समाज के भविष्य निर्माता हैं। उनका मूल दायित्व बच्चों को शिक्षा देना है। लेकिन चुनावी ड्यूटी के दौरान अनेक सरकारी स्कूलों के शिक्षक कक्षाओं में पढ़ाने की बजाय घर-घर जाकर मतदाता सूची सत्यापन, चुनावी सर्वे और अन्य जिम्मेदारियां निभाते नजर आते हैं।

चिलचिलाती धूप और कठिन परिस्थितियों में हाथों में फाइलें लेकर गलियों में खड़े यही शिक्षक देश के नौनिहालों के भविष्य की जिम्मेदारी भी संभालते हैं।

नतीजा यह होता है कि—

ब्लैकबोर्ड सूने रह जाते हैं, कक्षाओं में पढ़ाई प्रभावित होती है और बच्चों का शैक्षणिक नुकसान बढ़ता जाता है।

 

गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की मूक पीड़ा:

इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है जो अपने बच्चों की शिक्षा के लिए सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं।

आर्थिक रूप से मजबूत परिवार अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं, जहां शिक्षा व्यवस्था अपेक्षाकृत नियमित रहती है। लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और नियमित पढ़ाई पर निर्भर होते हैं।

 

जब सरकारी स्कूलों में शिक्षक लंबे समय तक चुनावी कार्यों में व्यस्त रहते हैं तो इसका सीधा असर उन्हीं बच्चों पर पड़ता है जिनके पास शिक्षा के अन्य विकल्प सीमित हैं।

कई अभिभावक इस स्थिति से परेशान होते हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक मजबूरियों के कारण अपनी आवाज मजबूती से नहीं उठा पाते।:

 

जिम्मेदारी शिक्षकों की या व्यवस्था की?

विडंबना यह है कि जब पढ़ाई प्रभावित होती है और बच्चों के परिणाम कमजोर आते हैं तो अक्सर सवाल शिक्षकों से पूछा जाता है।

जबकि वास्तविक आवश्यकता ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें चुनाव भी पूरी निष्पक्षता से हों और शिक्षा व्यवस्था भी बाधित न हो।

कई शिक्षकों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने भी अपनी चिंता व्यक्त की है कि चुनावी कार्यों के कारण जब वे अपने मूल कार्य से दूर रहते हैं तो उसका असर बच्चों और समाज दोनों पर पड़ता है।

 

चुनाव ड्यूटी के बाद भी खत्म नहीं होती परेशानी:

चुनाव से जुड़ी जिम्मेदारियां केवल मतदान तक सीमित नहीं रहतीं। कई बार चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवाद या कानूनी मामले वर्षों तक चलते हैं, जिसमें कर्मचारी अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं।

ऐसे मामलों में शिक्षक और अन्य कर्मचारी अपने मूल विभागों से लंबे समय तक जुड़े नहीं रह पाते, जिसका असर सरकारी सेवाओं पर पड़ता है।

 

प्रशासनिक कामकाज भी होता है प्रभावित:

चुनावी ड्यूटी में केवल शिक्षक ही नहीं बल्कि प्रशासनिक अधिकारी, सचिवालय कर्मचारी, सुपरिटेंडेंट, क्लर्क और विभिन्न विभागों के कर्मचारी भी लगाए जाते हैं।

इसके कारण—

आम जनता के कार्यों में देरी होती है।

 

सरकारी कार्यालयों में काम की गति धीमी पड़ती है।

 

जनहित से जुड़े मामलों में लंबित कार्य बढ़ते हैं।

 

प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

 

बड़ा सवाल — चुनाव आयोग का अपना स्थायी कैडर क्यों नहीं?

जब देश में पुलिस, सेना, रेलवे, डाक और आयकर जैसे बड़े विभागों के पास अपना स्थायी ढांचा और प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद हैं, तो चुनाव जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया के लिए भी एक समर्पित चुनावी कैडर क्यों नहीं होना चाहिए?

एक स्वतंत्र और स्थायी चुनावी व्यवस्था से—

सरकारी विभागों पर अतिरिक्त बोझ कम होगा।

 

शिक्षकों को शिक्षा के मूल कार्य के लिए पर्याप्त समय मिलेगा।

 

प्रशासनिक कामकाज प्रभावित नहीं होगा।

 

चुनाव प्रक्रिया और अधिक विशेषज्ञ एवं मजबूत बनेगी।

जवाबदेही और पारदर्शिता और बढ़ेगी।

 

सुधार की आवश्यकता है, टकराव की नहीं:

मेरा उद्देश्य चुनाव आयोग या लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना नहीं है, बल्कि लोकतंत्र को और मजबूत बनाने की दिशा में एक जरूरी सुझाव रखना है।

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने से मजबूत नहीं होता, बल्कि तब मजबूत होता है जब देश के बच्चों का भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और आम नागरिकों की सुविधाएं भी सुरक्षित रहें।

 

केंद्र सरकार, संसद और संबंधित संस्थाओं को इस विषय पर गंभीर विचार करना चाहिए कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र के लिए एक स्वतंत्र, प्रशिक्षित और स्थायी चुनावी कैडर (Dedicated Electoral Cadre) तथा आवश्यक चुनावी ढांचा समय की मांग है।

क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत केवल वोट की स्याही में नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य में भी होती है।

 

सादर प्रकाशनार्थ।

राजबीर सिंह भारतीय

समाजसेवी एवं सेवानिवृत्त सुपरिटेंडेंट,

कार्यालय महाधिवक्ता (AG Office), हरियाणा,

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़।

Ravinder Popli

House No. 3592, Sector 35 D, Chandigarh 9988293592/9780863592

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