लिवर ट्रांसप्लांट के 15 साल बाद भी नहीं टूटा हौसला, पति-पत्नी ने नेशनल ट्रांसप्लांट गेम्स में जीते पांच पदक
पत्नी ने लिवर का 65 प्रतिशत हिस्सा दान कर पति को दिया था नया जीवन, आज दोनों खेल के मैदान में बने प्रेरणा की मिसाल


(पुनीत महाजन)
चंडीगढ़। हौसले, हिम्मत और जीवन के प्रति सकारात्मक सोच हो तो बड़ी से बड़ी चुनौती को भी मात दी जा सकती है। इसका शानदार उदाहरण चंडीगढ़ के पी.के. रतन और उनकी पत्नी रूपा अरोड़ा ने पेश किया है। लिवर ट्रांसप्लांट के 15 साल बाद इस दंपति ने नेशनल ऑर्गन ट्रांसप्लांट गेम्स-2026 में शानदार प्रदर्शन करते हुए कुल पांच पदक अपने नाम किए हैं। नई दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में 1 नवंबर को आयोजित इन खेलों में पी.के. रतन ने दो स्वर्ण और एक कांस्य पदक जीता, जबकि उनकी पत्नी एवं लिवर डोनर रूपा अरोड़ा ने एक स्वर्ण और एक रजत पदक हासिल किया। दोनों की इस उपलब्धि ने न केवल चंडीगढ़ का नाम रोशन किया, बल्कि ट्रांसप्लांट के बाद भी सक्रिय और स्वस्थ जीवन जीने का प्रेरणादायक संदेश दिया।



इस दंपति की कहानी किसी मिसाल से कम नहीं है। पी.के. रतन का 5 जुलाई 2011 को लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था। उस कठिन समय में उनकी पत्नी रूपा अरोड़ा ने अपने लिवर का 65 प्रतिशत हिस्सा दान कर उन्हें नया जीवन दिया था। आज 15 वर्ष बाद दोनों ने साबित कर दिया है कि अंगदान से न केवल किसी की जिंदगी बचाई जा सकती है, बल्कि उसे दोबारा खुशहाल और सक्रिय जीवन जीने का अवसर भी दिया जा सकता है।
गौरतलब है कि पी.के. रतन और रूपा अरोड़ा इससे पहले वर्ष 2019 में वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। खेलों के प्रति उनका जुनून और निरंतर सक्रियता आज दूसरे ट्रांसप्लांट प्राप्तकर्ताओं के लिए प्रेरणा बन रही है।

नेशनल ऑर्गन ट्रांसप्लांट गेम्स के इस आयोजन में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन, केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव, NOTTO के निदेशक अनिल कुमार तथा सांसद बांसुरी स्वराज भी उपस्थित रहे।

इस प्रतियोगिता का आयोजन ORGAN India के सहयोग से सर गंगाराम अस्पताल और रेनल केयर फाउंडेशन द्वारा किया गया, जबकि NOTTO ने तकनीकी सलाहकार की भूमिका निभाई। दोनों खिलाड़ियों ने PGIMER चंडीगढ़ के हेपेटोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अजय दुसेजा से फिटनेस क्लीयरेंस प्राप्त करने के बाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया।
पी.के. रतन और रूपा अरोड़ा की यह उपलब्धि समाज को अंगदान के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ यह संदेश भी देती है कि अंग प्रत्यारोपण जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। पत्नी के त्याग और पति के अदम्य साहस से लिखी गई यह कहानी आज हजारों लोगों के लिए उम्मीद, विश्वास और प्रेरणा का प्रतीक बन गई है।

