गौड़िया मठ सेक्टर-20 में नरसिंह चतुर्दशी महोत्सव धूमधाम से मनाया गया

गौड़िया मठ सेक्टर-20 में नरसिंह चतुर्दशी महोत्सव धूमधाम से मनाया गया

शुद्ध देसी घी के 111 दीपकों से भव्य महाआरती की गई
चण्डीगढ़ : सेक्टर-20 स्थित श्री चैतन्य गौड़ीय मठ, सेक्टर 20 में नरसिंह चतुर्दशी का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित हुए और दिनभर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।
मठ के प्रवक्ता जयप्रकाश गुप्ता ने बताया कि प्रातःकाल मंगल आरती के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसके बाद भक्तों में विशेष उत्साह देखने को मिला। श्रद्धालुओं ने उपवास रखकर भगवान नरसिंह देव का स्मरण किया और भजन-कीर्तन में भाग लिया।
मठ के प्रभारी सन्यासी त्रिदंडी स्वामी वामन महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए नरसिंह अवतार की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि भगवान विष्णु ने अपने परम भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नरसिंह रूप धारण कर अत्याचारी राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस कथा के माध्यम से उन्होंने भक्ति, आस्था और धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला। महाराज जी ने बताया कि भगवान नरसिंह देव को याद करने से घर में सभी विघ्नों का नाश होकर मंगल होता है और भगवान की भक्ति प्राप्त होती है, इसलिए उन्हें सर्व विघ्न विनाशक नरसिंह देव कहा जाता है।
महोत्सव के दौरान भगवान श्रीकृष्ण को चंदन लेपन कर नरसिंह देव के रूप में सजाया गया और आकर्षक आभूषणों से अलंकृत किया गया। सायंकाल भगवान के अवतरण समय पर पंचामृत एवं फलों के रस से अभिषेक किया गया। इसके बाद शुद्ध देसी घी के 111 दीपकों से भव्य महाआरती की गई।
इस अवसर पर भगवान को 56 प्रकार के व्यंजनों का महाभोग अर्पित किया गया। सैकड़ों श्रद्धालुओं ने संकीर्तन में भाग लेकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया और “नरसिंह देव की जय” के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठा।
कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं ने वैष्णव वेशभूषा में शामिल होकर भगवान को अर्पित फलाहार प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन ने भक्तों में धार्मिक आस्था और उत्साह का संचार किया।
नरसिंह अवतार की कथा
मठ के प्रभारी सन्यासी त्रिदंडी स्वामी वामन महाराज ने नरसिंह अवतार की कथा सुनाते हुए बताया कि भगवान नरसिंह का अवतार भगवान विष्णु के प्रमुख दशावतारों में से एक माना जाता है। यह कथा भक्त और भगवान के अटूट संबंध तथा अधर्म पर धर्म की विजय को दर्शाती है।
कहानी के अनुसार, दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु अत्यंत शक्तिशाली और अहंकारी था। उसने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि उसे न कोई मनुष्य मार सके, न कोई पशु; न दिन में, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र-शस्त्र से।
इस वरदान के घमंड में उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया और राज्य में भगवान विष्णु की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का परम भक्त था। उसने पिता के आदेश को मानने से इंकार कर दिया और हर समय भगवान का स्मरण करता रहा।
हिरण्यकशिपु ने क्रोधित होकर प्रह्लाद को कई प्रकार की यातनाएँ दीं—जहर पिलाया, आग में जलाने की कोशिश की, ऊँचाई से गिरवाया—लेकिन हर बार भगवान विष्णु ने अपने भक्त की रक्षा की।
एक दिन क्रोध में आकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि उसका भगवान कहाँ है। प्रह्लाद ने उत्तर दिया—“भगवान हर जगह हैं।” तब हिरण्यकशिपु ने एक खंभे की ओर इशारा कर पूछा, “क्या इसमें भी?” जैसे ही उसने खंभे पर प्रहार किया, उसमें से भगवान विष्णु ने भगवान नरसिंह (आधा मनुष्य, आधा सिंह) के रूप में प्रकट होकर उसे पकड़ लिया।
नरसिंह भगवान ने उसे संध्या समय (न दिन, न रात), महल के द्वार की चौखट पर (न अंदर, न बाहर), अपनी जाँघ पर बैठाकर (न धरती, न आकाश) और अपने नाखूनों से (न अस्त्र, न शस्त्र) उसका वध किया। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान की सभी शर्तों को पूर्ण करते हुए अधर्म का अंत किया।
अंत में भगवान नरसिंह ने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया और धर्म की स्थापना की।
महाराज जी ने बताया कि यह कथा सिखाती है कि सच्ची भक्ति, विश्वास और धर्म की शक्ति सबसे बड़ी होती है, और अंततः सत्य की ही विजय होती है।



