अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में स्थानीय शिक्षिका सुधा मेहता ने रखा मानव मूल्यों का पक्ष

एआई युग में नैतिक शिक्षा और गर्भ संस्कार का महत्व समझाया सुधा मेहता ने
अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में स्थानीय शिक्षिका सुधा मेहता ने रखा मानव मूल्यों का पक्ष 
चण्डीगढ़ : डॉ. भीमराव आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित दो-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “डिजिटल समाज और मानव मूल्य : एआई युग में एकात्म मानव दर्शन की प्रासंगिकता” में चंडीगढ़ की शिक्षिका एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (एबीआरएसएम) चंडीगढ़ यूनिट की जनरल सेक्रेटरी (महिला विंग) सुधा मेहता ने सक्रिय सहभागिता करते हुए मानव मूल्यों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया।
देश-विदेश से आए लगभग 800 शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और शोधार्थियों की उपस्थिति में आयोजित इस संगोष्ठी में तकनीकी प्रगति और मानवीय संवेदनाओं के संतुलन पर व्यापक चर्चा हुई। वक्ताओं ने माना कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधुनिक समाज की अनिवार्य आवश्यकता है, किंतु इसके प्रभावी और सकारात्मक उपयोग के लिए नैतिक दृष्टिकोण आवश्यक है।
अपने संबोधन में सुधा मेहता ने कहा कि एआई कितना भी उन्नत क्यों न हो जाए, वह केवल डेटा का विश्लेषण कर सकता है; किंतु नैतिक मूल्य, करुणा, संवेदना और संस्कार किसी भी प्रकार के डेटा से नहीं सिखाए जा सकते। ये गुण केवल मानवीय शिक्षा और पारिवारिक संस्कारों से ही विकसित होते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण जन्म के बाद नहीं, बल्कि गर्भावस्था से ही ‘गर्भ संस्कार’ प्रक्रिया के माध्यम से प्रारंभ होना चाहिए। “माँ अपनी कोख में पल रहे शिशु को सकारात्मक विचारों, श्रेष्ठ साहित्य और आध्यात्मिक चेतना से जोड़कर भविष्य की सशक्त पीढ़ी का निर्माण कर सकती है,” उन्होंने कहा।
श्रीमती मेहता ने परिवार, समाज और राष्ट्र की संयुक्त भूमिका पर बल देते हुए कहा कि यदि अगली पीढ़ी को तकनीक के साथ-साथ नैतिक दिशा भी दी जाएगी, तो वह न केवल आधुनिक मशीनरी को दक्षता से संचालित करेगी, बल्कि देश के समग्र विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देगी।
संगोष्ठी के अंत में यह संकल्प व्यक्त किया गया कि शिक्षा व्यवस्था में मानवीय मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक शिक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि डिजिटल युग में भी मानवता सर्वोपरि बनी रहे।



