आत्म-संयम, नैतिकता और चरित्र बल ही सच्चा धन है : स्वामी रसिक महाराज

आत्म-संयम, नैतिकता और चरित्र बल ही सच्चा धन है : स्वामी रसिक महाराज

चण्डीगढ़ :श्री राधा कृष्ण मंदिर सैक्टर 40 ए में शिवशक्ति कथा के दूसरे दिन व्यासपीठ पर विराजमान नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने बताया कि वास्तव में, आत्म-संयम ही वह आधारशिला है, जिस पर एक सुदृढ़, नैतिक और संतुलित समाज की रचना सम्भव है। संयम व्यक्ति के आंतरिक बल, विवेक और प्रज्ञा को जागृत करता है, जिससे उसका जीवन निरन्तर पवित्रता और श्रेष्ठता की दिशा में आगे बढ़ता है। आत्म-संयम केवल बाह्य आचरण का नियंत्रण नहीं, बल्कि यह अन्तःकरण में स्थित समस्त विकारों एवं दुर्बलताओं का निराकरण है। जो व्यक्ति आत्म-संयम से युक्त होता है, उसके मन में सदाचार, विनम्रता, दया, सत्य तथा अहिंसा जैसे दिव्य गुण स्वतः प्रस्फुटित होते हैं।

जब व्यक्ति प्राकृतिक नियमों, सदाचार और मर्यादाओं का पालन करता है, तो न केवल उसका स्वयं का जीवन संतुलित और समृद्ध होता है, बल्कि समाज में भी नैतिकता, शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित होती है। व्यक्ति के सदाचरण का प्रभाव केवल स्वयं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका सकारात्मक प्रभाव परिवार, समुदाय एवं समस्त समाज तक पहुँचता है। प्रत्येक सदाचारी एवं संयमी व्यक्ति अपने आचरण से समाज को प्रेरणा देता है, जिससे सामाजिक जीवन में आपसी सहयोग, सम्मान और सद्भाव का वातावरण निर्मित होता है।

संयम हमें आवेगों, लालसाओं और अनुचित इच्छाओं से बचाता है, जिससे व्यक्ति का मनोबल, आत्मशक्ति और चरित्र दृढ़ बनता है। आवेगों का नियंत्रण ही व्यक्ति को मानसिक शान्ति, धैर्य और स्थिरता प्रदान करता है। जहाँ संयम का अभाव होता है, वहाँ व्यक्ति अपने मनोबल और ऊर्जा को अनावश्यक एवं अनुचित विषयों में नष्ट कर देता है। इसके विपरीत, आत्म-संयमित व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म को सतत् शुद्ध एवं उज्ज्वल बनाए रखता है, जिससे उसका चरित्र दृढ़ और आत्मबल प्रबल हो जाता है। आज इस अवसर पर मंदिर सभा एवं हिन्दू पर्व महासभा के चण्डीगढ़ प्रदेश प्रधान वी पी अरोड़ा, महासचिव विनय कपूर, आचार्य, आचार्य संचित बिजल्वाण, साध्वी मां देवेश्वरी, आचार्य जयदेव मिश्रा, मंजू रावत, लक्ष्मी सजवाण एवं बड़ी संख्या में शिवभक्त उपस्थित रहे।



